इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अहम दृष्टिकोण रखते हुए यह रेखांकित किया है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़िता की आयु को प्रमाणित करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक आवश्यक कानूनी शर्त है। न्यायालय के अनुसार, उम्र से संबंधित निष्कर्ष अनुमान, अधूरे साक्ष्य या केवल मौखिक दावों के आधार पर नहीं निकाले जा सकते।

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि आयु निर्धारण के लिए विधि द्वारा मान्य दस्तावेज—जैसे जन्म प्रमाण पत्र, विद्यालय के अभिलेख या सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाण—निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यदि अभियोजन पक्ष इस बुनियादी तथ्य को ठोस रूप से सिद्ध नहीं कर पाता, तो इससे पूरे मामले की कानूनी नींव प्रभावित होती है।

न्यायालय ने यह भी दोहराया कि न्याय प्रणाली का उद्देश्य भावनाओं या सार्वजनिक दबाव से संचालित होना नहीं है, बल्कि प्रमाण, प्रक्रिया और निष्पक्षता के आधार पर निर्णय देना है। न्याय केवल दंड देने तक सीमित नहीं, बल्कि सभी पक्षों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना भी उसका दायित्व है।

इस टिप्पणी के माध्यम से अदालत ने यह संतुलित संदेश दिया कि जहाँ पीड़ित के हितों की रक्षा अत्यंत आवश्यक है, वहीं आरोपी के कानूनी अधिकारों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। प्रभावी जांच, प्रामाणिक दस्तावेज और निष्पक्ष सुनवाई ही न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को मजबूत बनाते हैं।

यह दृष्टिकोण पुलिस, अभियोजन एजेंसियों और समाज के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि संवेदनशील और गंभीर मामलों में भी कानून द्वारा निर्धारित मानकों और प्रक्रियाओं से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

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